चाय की चुस्कियाँ,
प्यालियों की अठखेलियाँ,
सामने मेज़ के,
सजकर बैठी मेरी सहेलियाँ ।
खुशबूदार, खुशनुमा माहौल है,
सजा- सवरा उनके सामने,
आज,
सुंदर - सा मेज़ एक गोल है।
कभी-कभी,
यह मेज़,
है,
किसी भी,
घर का।
किसी के,
दफ़्तर का ।
मेरे अपने,
स्टाफ - रूम का ।
रेस्तरां का, स्टेशन का…..!!
सच कहूँ, तो
इस ब्रह्मांड में,
है, हर जगह का ।
कैसे भला???
क्योंकि!!
मेज़ है यह
' चाय का! '
असाधारण है यह!!
भई!!
रिश्ते बनते हैं यहाँ,
भविष्य रचते है यहाँ।
कार्य- सम्पूर्ण यहाँ,
और स्वाहा भी यहाँ।
कई पकवान भी
पकते ,
बैठे - बैठे यहाँ।
मेहमानों की खातिरदारी यहाँ,
इंतजार के लम्हे बीते यहाँ।
थकावट उतरे,
मिले,
तरावट यहाँ।
यादों की बारात में भी,
खो जाते हम,
यदा-कदा,
यहाँ ।
मस्त, खट्टी-मीठी,
कसैली चुगलियाँ…
दे जाती, कभी सकून,
तो कभी मिलती,
बवंडर को हवा भी यहाँ।
लगता,
कहना चाहता है।
जो कुछ भी है,
है…..
मेरी खामोशी,
के आस - पास यहाँ।
करनी हो तुम्हें
चाहे कोई भी बात,
'मैं ' तो जरूरी हूँ,!
'बिन मेरे' तुम्हारी,
हर बात अधूरी है।
कहने - सुनने के दौर में,
' खामोशी' भी जरूरी है।
चुपचाप सब,
' मैं 'सुनता हूँ,
किसी से,
कुछ न कहता हूँ।
इसीलिए,
लगभग,
सजा सवरा- सा रहता हूँ।
कर्मठता से,
काम अपना मैं,
करता हूँ ।
- श्री ए. रेनू
Bahut hi khoobsurat panktiyan😍
ReplyDeleteThanks ☺️ dear
DeleteLovely ……
ReplyDeleteThanks ☺️ dear
DeleteNice
ReplyDelete🙏
DeleteA lovely Personification..
ReplyDeleteGod Bless!
🙏
Delete🙏
Delete👏👏👏
ReplyDelete🙏
Delete🙏
DeleteVery nice maam
ReplyDelete🙏
Delete🙏
DeleteBeautifully worded
ReplyDeleteGreat poetry
ReplyDeleteAmazing lines👌👏🏻
ReplyDeleteAmazing.
ReplyDeleteBeautiful ❤
ReplyDeleteGood one. God bless.
ReplyDeleteLovely
ReplyDeleteBeautiful poem👍🏻
ReplyDeleteGreat
ReplyDeleteBeautiful poem
ReplyDeleteNice
ReplyDelete🙏
DeleteBahut khoob
ReplyDelete🙏
DeleteBeautiful poem
ReplyDeleteAwsome 👍👏👏
ReplyDeleteAwsome
ReplyDeleteAwesome ❤️
ReplyDeleteWah wah mza aa gya
ReplyDeleteWah wah
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