चहके चिड़िया, कूहके कोयल,
ले आया...
समय….
फिर से,
धरा पर,
मार्च का यौवन।
कोमल पत्ते, रंग रंगीले,
नव यौवना से भरमीले।
मन को भाते हाथ न आते,
दूर शाख पर गतिमान इतराते।
शोभा प्रकृति की बढ़ाते,
नैनौ से मन में बस जाते,
देख, रब्ब की!!
यह कारीगरी…
नतमस्तक हम हो जाते। 🙏🙏
-श्री ए. रेनू