तेरे-मेरे मन की चाबी,
एक…..
वो भी तेरे पास में।
और,
मन का तू मौज़ी,
एक,
जगह तू टिक जाए।
ना,
बस की तेरे बात रे।
काश !
कभी ऐसा हो जाए,
चाबी,
हाथ मेरे लग जाए।
फेंकूँ,
पार सात समंदर पार,
खत्म,
हो जाए सारे फसाद रे!
घर,
तेरा-मेरा, मेरा - तेरा की,
उलझन,
से मुक्त हो सारे जज़्बात ये ।
खो जाए,
यह चाबी रब्बा!! रहे
संग,
मेरे, मेरा सजना, क्या दिन-क्या रात, रे।
-श्री ए.रेनू