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Friday, June 10, 2022

मेज़.... हमारी!

 चाय की चुस्कियाँ, 

प्यालियों की अठखेलियाँ, 

सामने मेज़ के, 

सजकर बैठी मेरी सहेलियाँ ।


खुशबूदार, खुशनुमा माहौल है, 

सजा- सवरा उनके सामने, 

आज, 

सुंदर - सा मेज़ एक गोल है। 


कभी-कभी, 

यह मेज़, 

है, 

किसी भी, 

घर का। 

किसी के, 

दफ़्तर का ।

मेरे अपने, 

स्टाफ - रूम का ।

रेस्तरां का, स्टेशन का…..!! 


सच कहूँ, तो 

इस ब्रह्मांड में, 

है, हर जगह का । 

 कैसे भला???


क्योंकि!! 

 मेज़ है यह 

' चाय का! '

असाधारण है यह!! 


भई!! 

रिश्ते बनते हैं यहाँ, 

भविष्य रचते है यहाँ। 

कार्य- सम्पूर्ण यहाँ, 

और स्वाहा भी यहाँ। 

कई पकवान भी 

पकते , 

बैठे - बैठे यहाँ। 

मेहमानों की खातिरदारी यहाँ, 

इंतजार के लम्हे बीते यहाँ। 

थकावट उतरे, 

मिले, 

तरावट यहाँ। 

यादों की बारात में भी, 

खो जाते हम, 

यदा-कदा,

 यहाँ । 

मस्त, खट्टी-मीठी, 

कसैली चुगलियाँ… 

दे जाती, कभी सकून, 

तो कभी मिलती, 

 बवंडर को हवा भी यहाँ। 


लगता, 

कहना चाहता है। 

जो कुछ भी है, 

है….. 

मेरी खामोशी, 

के आस - पास यहाँ। 


करनी हो तुम्हें 

चाहे कोई भी बात, 

'मैं ' तो जरूरी हूँ,! 

'बिन मेरे' तुम्हारी, 

हर बात अधूरी है। 

कहने - सुनने के दौर में, 

' खामोशी' भी जरूरी है।

चुपचाप सब, 

' मैं 'सुनता हूँ, 

किसी से, 

कुछ न कहता हूँ। 

इसीलिए, 

लगभग, 

सजा सवरा- सा रहता हूँ।

कर्मठता से,

काम अपना मैं, 

करता हूँ ।


                       - श्री ए. रेनू 


















35 comments:

  1. Bahut hi khoobsurat panktiyan😍

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  2. A lovely Personification..
    God Bless!

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  3. Beautifully worded

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  4. Amazing lines👌👏🏻

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  5. Good one. God bless.

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  6. Beautiful poem👍🏻

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  7. Awsome 👍👏👏

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Thanks ☺️

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