ज्ञान धरा है,
तेरी आँखों में।
लाज रखी है,
तेरी पलकों पे।
कैसे न भाए,?
तू सजना को ।
त्याग भरा तेरे,
आँचल में।
रहे तू निसदिन,
काम में लगी।
ध्यान में रही,
हर चीज़!!
क्या छोटी,
क्या बड़ी।
चितवन तेरी में,
तेज़ी है ।
मन के धागे में,
मज़बूती है।
इरादे तेरे से,
घर बसा।
गर, मनों में,
मलिनता आ जाए,
तो……
टूटन - फूटन भी
तेरी है!!!!!
सँभल और सँभाल ज़रा,
हे सज्जन स्त्री !!
कि अंततः
घर - गृहस्थी,
तेरी हैं।।।।।
-श्री ए. रेनू
Beautiful lines...
ReplyDeleteBeautiful lines 😍❣️❣️
ReplyDeleteTremendous Poem mam 👌👌
ReplyDeleteNice👌💫
ReplyDeleteGod Bless!
Lovely 👌
ReplyDeleteLovely lines 😍
ReplyDeleteVery thoughtful 👌🏻and filled with feelings ❣❣
ReplyDeleteWell expressed ma'am
ReplyDeleteWonderful
ReplyDeleteAmazing... Great work mam
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