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Tuesday, June 21, 2022

सज्जन स्त्री

 ज्ञान धरा है, 

तेरी आँखों में। 

लाज रखी है, 

तेरी पलकों पे। 

कैसे न भाए,? 

तू सजना को ।

त्याग भरा तेरे, 

आँचल में। 


रहे तू निसदिन, 

काम में लगी। 

ध्यान में रही, 

हर चीज़!! 

क्या छोटी, 

क्या बड़ी। 


चितवन तेरी में, 

तेज़ी है ।

मन के धागे में, 

मज़बूती है। 

इरादे तेरे से, 

घर बसा। 


गर, मनों में, 

मलिनता आ जाए, 

तो…… 

टूटन - फूटन भी 

तेरी है!!!!! 

सँभल और सँभाल ज़रा, 

हे सज्जन स्त्री !! 

कि अंततः 

घर - गृहस्थी, 

तेरी हैं।।।।। 

                         -श्री ए. रेनू 




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Thanks ☺️

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