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Wednesday, March 15, 2023

पुतला यह माटी का?

 पहन कर कपड़े उज्जले

बने आज , यह , वो… 

सब… यजमान… 

कहूँ , कहूँ  सब  'मैं' कहूँ, 

बस…… सब मेरी मान। 


जिंदगी बैठा दी दाव पर , 

बाँध घुंघर, साथ सयापे लाख, 

वह भी मस्त हो गई…. 

समझ 'खुद'  को भाग्यवान। 


बुद्धि बंद, अल्फाज़ चंद. 

श्वेतांबर के श्रेष्ठ पत्र पर , 

बस  …. बातें चंद….। 

….उसकी मनपसंद….. ।


मैं , मैं , मैं , मैं और बस मैं!!! 

मैं हूँ ,,,, मैं ही हूँ… 

जी, सबसे अच्छा। 

हाँ , सबसे सच्चा। 


देख सुन….. मत।।। 

और किसी को…. 

कहूँ…. कहूँ.. सब

 बस मैं कहूँ सब… 

मुझे सुनो….. बस

सुनो.  सुनो… बस।


रख समझ को परे, 

अक्ल को भेज परे, 

चाहे कहीं घास चरे, 

दृष्टि मायामंच पर रहे। 


कान सदा मुझ पर रहे, 

भविष्य चाहे आँच पर जले, 

भूख लगे न, न प्यास लगे, 

इतना भी तुझे ध्यान रहे। 


बैठी दाव पर जिन्दगी, 

सोचे…… 

 पुतला यह माटी का? 

न जाने?? 

किस ओर चला ??? 

              -श्री ए. रेनू 


 


6 comments:

Thanks ☺️

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