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Tuesday, September 13, 2022

जख़्म

 जख़्म वही भरते हैं

जो दिखते हैं। 

अनदेखा जख्म न दे, 

खुद को। 

ऐ इन्सान! 


सुना है…. 

कि अच्छे कर्मों, 

 के फल से, 

हम इंसान बनते हैं। 


गुपचुप, कर्म न कर, 

ऐ इन्सान! 

सुना है कि…. 

ऐसा करने वाले, 

आज गुमसुम रहते हैं। 


गुमराह अगर हुआ है, 

ऐ इन्सान!! 

तो सही राह पकड़ ले, 

 इस राह पर तो…… 

गुलामी के निशान मिलते हैं। 


अनचाहे मन से ही सही, 

शंकालु मन से ही सही, 

बस इक बार, 

आज़मा यह बात, 

ऐ इन्सान!! 

अनदेखे जख़्म,

खुद को, 

न दे,,,, 

ऐ इन्सान!!! 

                           -श्री ए. रेनू 




10 comments:

Thanks ☺️

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