जख़्म वही भरते हैं
जो दिखते हैं।
अनदेखा जख्म न दे,
खुद को।
ऐ इन्सान!
सुना है….
कि अच्छे कर्मों,
के फल से,
हम इंसान बनते हैं।
गुपचुप, कर्म न कर,
ऐ इन्सान!
सुना है कि….
ऐसा करने वाले,
आज गुमसुम रहते हैं।
गुमराह अगर हुआ है,
ऐ इन्सान!!
तो सही राह पकड़ ले,
इस राह पर तो……
गुलामी के निशान मिलते हैं।
अनचाहे मन से ही सही,
शंकालु मन से ही सही,
बस इक बार,
आज़मा यह बात,
ऐ इन्सान!!
अनदेखे जख़्म,
खुद को,
न दे,,,,
ऐ इन्सान!!!
-श्री ए. रेनू
Do good and expect nothing in return.
ReplyDeleteNice poem !
God Bless!
Excellent
ReplyDeleteVery nice 👌
ReplyDeleteVery beautifully written ☺😇
ReplyDeleteVery true!
ReplyDeleteDeep thoughts.... wonderful 👍😊
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteMam very nice poem
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteExcellent write up
ReplyDelete