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Thursday, June 30, 2022

'आज सावन बरस रहा था।'

 


 रिमझिम बूँदों की शक्ल में, 

टपटप, झटपट, रटपट, 

आज सावन बरस रहा था। 

तेरी, मेरी, इसकी, उसकी छत पर, 

बिन भेद के झूम - झूमा के,

आज बादल मस्ती में बरस रहा था। 


चहुँ ओर रिमझिम की मस्ती थी, 

मस्ती न यह सस्ती थी। 

सूखी आँखें बरस-भर, 

इन बूँदों को तरसी थी। 

जितना तुम तरसी थी, 

उतना ज़्यादा बरस रहा था।

सावन बन बादल, बन बारिश, 

तेरे, मेरे, इसके, उसके  मन में, 

बन धड़कन, धड़क रहा था। 

आज सावन बरस रहा था।। 


सावन! आए तुम….. 

तुम्हें आभार। 

छू लो तन - मन,

खिल जाए चितवन। 

रोशन फिज़ा कहे, 

बाहों को पसार, 

भर दो, भर दो, 

चहुँ ओर प्रेम की बौछार। 


दूर कहीं 'विरहिणी' कहे 

सावन से बारम्बार……. 

हो रे! बादल…. 

काहे! गड़- गड़ शोर मचाए, 

दामन से दामिनी को चमकाए, 

चंचलता तेरी से दिल घबराए, 

पंछी पत्तियों में दुबकाए, 

शिशु - जन - सम सुहृदय, 

डर के आँचल में छुप जाए ।

नीर भरे नभ में इतराए, 

पहल - पहल की दौड़ लगाए, 

श्याम- श्यामला  'बादल' , 

नभ - थल में धौंस जमाए ।

जाने क्यों? इतना शोर मचाए !! 


आज बादल बरस रहा था, 

तेरी, मेरी, इसकी, उसकी छत पर, 

बिन भेद के झूम - झूमा के बेबस, 

बादल मस्ती में  बरस रहा था।। 

        -   श्री ए. रेनू 









21 comments:

  1. Tremendous poem mam 👌👌👌

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  2. Nature showers its love in its own special way..
    Lovely imagination ma'am..
    God Bless!

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  3. 💦👌👍🏻

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  4. Beautiful 👌👌👌👌

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  5. Beautiful expression💞💞

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  6. Excellent 👍👍

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  7. Prakriti ki sunderta per bahut hi sunder kalpna🙏😍

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  8. 🙏👌❤️❤️🌿

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Thanks ☺️

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