जिंदगी को जिंदगी,
बनाने के लिए
'मैं'
तुझे किस
नाम से पुकारूँ ?
अपना….
एक नाम तो बता।
ऐ! ऊपरवाले,
नीली छतरी वाले !
मुझ ,
जाहिल की,
इस दुविधा का
हल तो बता ।
सोच - समझ कर,
बोला….
नीली छतरी वाला।
रचा मैंने सारा संसार,
नक्षत्र, तारे, नभ, गण,
जन, मन।
सारा ब्रह्मांड !!!
पर….
मैं!!!!
एक से अनेक हुआ,
कैसे?
एकवचन से बहुवचन हुआ,
कैसे?
यह तो….
मुझे भी नहीं पता।
हाँ ! एक बात तो
कह देता हूँ
चाहे रच लिया
समस्त संसार।
पर ….
मानव ' हृदय ' ही है
जिसे ' दिल' भी कह लेते हैं।
मेरा प्रिय निवास स्थान।
हृदय में रख लो !!
हृदय से कह लो
जो भी भाए ,
तुमको नाम।
चित - हित रखो,
सुख - धन माँगो।
लेकर!!
कोई…… भी नाम।
-श्री ए. रेनू।
Awsome...love all the poems.
ReplyDeleteAwsome 👏👏
ReplyDeleteAwsome👏👏
ReplyDeleteVery nice 👏👏
ReplyDeleteअद्भुत 👏👏👏👏👏
ReplyDeleteLovely …. Such a complex thing told so simply….
ReplyDeleteThank you so much dear 💖 for such a lovely comment.
DeleteVery nice
ReplyDeleteBeautiful
ReplyDeleteExcellence at par👏🏽
ReplyDelete🌹🌹
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteExpressed beautifully ma'am
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteLovely
ReplyDeleteVery true ma'am
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